कपास की खेती भारत की सबसे महत्वपूर्ण रेशा और नगदी फसल में से एक है| और देश की औदधोगिक व कृषि  अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख भूमिका निभाता है| कपास की खेती लगभग पुरे विश्व में उगाई जाती है| यह कपास की खेती वस्त्र उद्धोग को बुनियादी कच्चा माल प्रदान करता है| भारत में कपास की खेती लगभग 6 मिलियन किसानों को प्रत्यक्ष तौर पर आजीविका प्रदान करता है और 40 से 50 लाख लोग इसके व्यापार या प्रसंस्करण में कार्यरत है|

व्यावसायिक रूप से कपास की खेती को सफेद सोना के रूप में भी जाना जाता है| देश में व्यापक स्तर पर कपास उत्पादन की आवश्यकता है| क्योंकी कपास का महत्व इन कार्यो से लगाया जा सकता है इसे कपड़े बनते है, इसका तेल निकलता है और इसका विनोला बिना रेशा का पशु आहर में व्यापक तौर पर उपयोग में लाया जाता है|

लम्बे रेशा वाले कपास को सर्वोतम माना जाता है जिसकी लम्बाई 5 सेंटीमीटर इसको उच्च कोटि की वस्तुओं में शामिल किया जाता है| मध्य रेशा वाला कपास (Cotton) जिसकी लम्बाई 3.5 से 5 सेंटीमीटर होती है इसको मिश्रित कपास कहा जाता है| तीसरे प्रकार का कपास छोटे रेशा वाला होता है| जिसकी लम्बाई 3.5 सेंटीमीटर होती है|

कपास हेतु जलवायु

कपास की उत्तम फसल के लिए आदर्श जलवायु का होना आवश्यक है| फसल के उगने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेंटीग्रेट और अंकुरण के लिए आदर्श तापमान 32 से 34 डिग्री सेंटीग्रेट होना उचित है| इसकी बढ़वार के लिए 21 से 27 डिग्री तापमान चाहिए| फलन लगते समय दिन का तापमान 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तथा रातें ठंडी होनी चाहिए| कपास के लिए कम से कम 50 सेंटीमीटर वर्षा का होना आवश्यक है| 125 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा का होना हानिकारक होता है|

 

 

उपयुक्त भूमि
कपास के लिए उपयुक्त भूमि में अच्छी जलधारण और जल निकास क्षमता होनी चाहिए| जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है, वहां इसकी खेती अधिक जल-धारण क्षमता वाली मटियार भूमि में की जाती है| जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हों वहां बलुई एवं बलुई दोमट मिटटी में इसकी खेती की जा सकती है| यह हल्की अम्लीय एवं क्षारीय भूमि में उगाई जा सकती है| इसके लिए उपयुक्त पी एच मान 5.5 से 6.0 है| हालाँकि इसकी खेती 8.5 पी एच मान तक वाली भूमि में भी की जा सकती है|

उन्नत किस्में

किसान भाइयों वर्तमान में बी टी कपास का बोलबाला है| जिसकी किस्मों का चुनाव आप अपने क्षेत्र, परिस्थितियों और क्षेत्र की प्रचलित किस्म के अनुसार ही करें| पिछले 10 से 12 वर्षों में बी टी कपास की कई किस्में भारत के सभी क्षेत्रों में उगाई जाने लगी हैं| जिनमें मुख्य किस्में इस प्रकार से हैं, जैसे- आर सी एच- 308, आर सी एच- 314, आर सी एच- 134, आर सी एच- 317, एम आर सी- 6301, एम आर सी- 6304 आदि है|

खेत की तैयारी

दक्षिण व मध्य भारत में कपास वर्षा-आधारित काली भूमि में उगाई जाती है| इन क्षेत्रों में खेत तैयार करने के लिए एक गहरी जुताई मिटटी पलटने वाले हल से रबी फसल की कटाई के बाद करनी चाहिए, जिसमें खरपतवार नष्ट हो जाते हैं और वर्षा जल का संचय अधिक होता है| इसके बाद 3 से 4 बार हैरो चलाना काफी होता है| बुवाई से पहले खेत में पाटा लगाते हैं, ताकि खेत समतल हो जाए| उत्तरी भारत में कपास की खेती मुख्यतः सिंचाई आधारित होती है|

इन क्षेत्रों में खेत की तैयारी के लिए एक सिंचाई कर 1 से 2 गहरी जुताई करनी चाहिए एवं इसके बाद 3 से 4 हल्की जुताई कर, पाटा लगाकर बुवाई करनी चाहिए| कपास का खेत तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि खेत पूर्णतया समतल हो ताकि मिटटी की जलधारण एवं जलनिकास क्षमता दोनों अच्छे हों| यदि खेतों में खरपतवारों की ज्यादा समस्या न हो तो बिना जुताई या न्यूनतम जुताई से भी कपास की खेती की जा सकती है|

बीज की मात्रा
संकर तथा बी.टी. के लिए चार किलो प्रमाणित बीज प्रति हैक्टेयर डालना चाहिए| देशी और नरमा किस्मों की बुवाई के लिए 12 से 16 किलोग्राम प्रमाणित बीज प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें| बीज लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर डालें|

बुवाई का समय तथा विधि

1. कपास की बुवाई का उपयुक्त समय अप्रेल के द्वितीय पखवाड़े से मई के प्रथम सप्ताह तक है|

2. अमेरिकन किस्मों की कतार से कतार की दूरी 60 सेन्टीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेन्टीमीटर रखनी चाहिये|

3. देशी किस्मों में कतार से कतार की दूरी 45 सेन्टीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेन्टीमीटर रखनी चाहिये|

4. बी टी कपास की बुवाई बीज रोपकर (डिबलिंग) 108 X 60 सेंटीमीटर अर्थात 108 सेंटीमीटर कतार से कतार और पौधे से पौधे 60 सेंटीमीटर या 67.5 X 90 सेंटीमीटर की दूरी पर करें|

5. पौलीथीन की थैलियों में पौध तैयार कर रिक्त स्थानों पर रोप कर वांछित पौधों की संख्या बनाये रख सकते हैं|

6. लवणीय भूमि में यदि कपास बोई जाये तो मेड़े बनाकर मेड़ों की ढाल पर बीज उगाना चाहिए|

खाद एवं उर्वरक

1. बुवाई से तीन चार सप्ताह पहले 25 से 30 गाड़ी गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से जुताई कर भूमि में अच्छी तरह मिला देवें|

2. अमेरिकन और बीटी किस्मों में प्रति हैक्टेयर 75 किलोग्राम नत्रजन तथा 35 किलोग्राम फास्फोरस की आवश्यकता पड़ती है|

3. देशी किस्मों को प्रति हैक्टेयर 50 किलोग्राम नत्रजन और 25 किलो फास्फोरस की आवश्यकता होती है|

4. पोटाश उर्वरक मिट्टी परीक्षण के आधार पर देवें, फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पहले देवें| नत्रजन की शेष आधी मात्रा फूलों की कलियां बनते समय देवें|